सोमवार, 23 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ….. (3)

अब तक …
 अपने सपने की तलाश ने तेजस्वी को " वायब्रेंट मिडिया हाउस "पहुंचा दिया है।   

पत्रकारिता को अपना जूनून माने वाली तेजस्वी  को आखिर अपनी पसंद का कार्य मिल  ही गया।  घर -बाहर , आसपास उसके उत्साह पर चुनातियों के छींटे दस्तक  देने लगे हैं , ना जाने कौन -सा रंग होगा इनका .... 

अब आगे ……


कैसा रहा आज का दिन।  माँ उसका रास्ता ही देख रही थी। 
बहुत अच्छा , थकान हो रही है लेकिन अब।  
फ्रेश होकर थोड़ी देर  आराम कर लो ,  खाना बन रहा है. साथ ही  खायेंगे .  

होती  रहेंगी परीक्षाएं  … हाथ -मुंह धोकर  फ्रेश होने से काउच पर चैन से पसरते शब्द उसके कानों में गूंजते रहे। माँ  छोटी बहन मनस्वी के साथ टेबिल पर खाना लगाकर सबको बुला  रही थी। चार लोगो के छोटे से  परिवार में रात  खाना एक साथ ही करने का एक अलिखित नियम सा था। भाई   मयूर और उसके पिता भी पहुँच चुके थे डाइनिंग टेबिल तक।  

माँ , लोग बेटियों को क्यों पढ़ाते हैं , बस एक अच्छा रिश्ता मिल जाए , सिर्फ इसलिए ही। तेजस्वी के  दिन भर के अनुभव के बारे में कोई उससे पूछे, उससे पहले ही वह अपने सवाल के  साथ तैयार थी। 

मकसद यही हो , जरुरी नहीं।  मगर अच्छा रिश्ता हो जाए , यह तो सभी माता- पिता चाहते होंगे।

उसने सीमा के बारे में बताया , सीमा बीटेक  के आखिरी वर्ष में थी।  

मुझे पता है , लड़के ने भी अभी बीटेक किया है , कैम्पस सलेक्शन हो चुका  है। लड़के के माता -पिता दोनों ही सरकारी सेवा में हैं , उसकी बड़ी बहन विदेश में सैटल है।  उन्हें सीमा के आगे पढ़ने में भी कोई समस्या नहीं है।  इस रिश्ते में कोई समस्या मुझे नजर नहीं आती।  

मगर माँ , सीमा की परीक्षाएं हैं , शादी के कुछ दिन बाद ही। 

मुहूर्त नहीं था आगे का , लड़के की बहन भी अभी ही आ सकती थी विदेश से। उनके नजरिये से भी देखो। 

खाने के समय हम क्यों उलझ रहे हैं दूसरों की जिंदगियों से। तुम बताओ , सब ठीक रहा आज। पिता ने हस्तक्षेप करते हुए बात को बहस में बदलने से रोका  . खाना खाते हुए वे दिन  भर  के कार्यकलापों पर बातचीत करते रहे। 

दिन पर दिन गुजरते  रहे।  आलिया  के साथ उसके साथियों की मीटिंग होती , लक्ष्य निर्धारित होते   .  स्त्रियों की शिक्षा व  सुरक्षा से सम्बधित योजनाओं और कानून की जानकारी एकत्रित करने के लिए स्त्रियों से जुड़े कई समाजसेवी संगठनों से मिलना , विभिन्न आंकड़े एकत्रित करना , साक्षात्कार लेना  ,रिपोर्ट तैयार करना ,  उनको आलेख अथवा समाचार में बदलना , कार्य के ढेर में ढेर होते तेजस्वी अपने कार्य में प्रवीण होती जा रही थी। 

अपने कार्य के प्रति समर्पित तेजस्वी  अपने अन्य साथियों के मुकाबले विनम्र और हंसमुख होने के कारण सभी से घुली मिली रहती। आलिया का उस पर यकीन  बढ़ता  जाता था।  एक दिन आलिया ने उसे केबिन में बुलाकर शक्ति  सदन की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। शक्ति  सदन के फाउंडर ,सदस्यों ,  प्रताड़ित स्त्रियों की कानूनी सहायता करने , उन्हें आवास उपलब्ध कराने , आर्थिक मदद हेतु कार्य की व्यवस्था , कार्य निष्पादन मूल्यांकन  करने तथा उनसे सम्बंधित विभिन्न आंकड़े जुटाने थे.  इस कार्य के विस्तार और समय के तकादे के मद्देनजर आलियां ने तेजस्वी को एक और साथी को इस प्रोजेक्ट से जोड़ लेने के निर्देश भी दिए। 

सिमरन प्रशिक्षण अवधि में उसकी  साथी थी।   उनकी अच्छी मित्रता भी  हो चली  थी. तेजस्वी ने इस कार्य के लिए सिमरन के नाम की सिफारिश की। एक ही साथ कार्य करते दोनों आपस के अनुभव बांटती। जब -तब सिमरन उसके पास आ कर बैठ जाती और विभिन्न विभागों के हर व्यक्ति से जुडी ख़बरें सुनाती रहती।  पता नहीं वह इतनी सूचनाएं कहाँ से जुटाती थी। काम के बीच सर जुड़ाए खुसर- पुसर करते ,  देख दूसरे साथी बहुत चिढ़ते कि आखिर  ये यहाँ क्या करने आई हैं  मगर सिमरन पर कुछ असर न होता। 
कार्य के बीच चर्चा , विमर्श के दौरान जब भी वे लोग अन्य साथियों के साथ होते ,  सिमरन तेजस्वी की प्रशंसा ही करती  नजर आती।    तुम कितनी सुन्दर हो , तुम लिखती कितना अच्छा हो , .कितनी मेहनती  हो।  तेजस्वी विनम्रता से अपनी प्रशंसा सुनते हुए थोडा सकुचाती .  वह कई बार दबी जुबान में उसे मना  भी करती। 

अब सिमरन और तेजस्वी को अपने इस कार्य की रिपोर्ट वायब्रेंट  मिडिया हाउस  की विभागीय प्रभारी सुचित्रा को देनी थी।  स्त्रियों से जुड़े  सभी विषयों को  सुचित्रा ही देखती थी।  आलिया  से बिलकुल विपरीत  सुचित्रा अत्यंत सख्त मिजाज थी। अपने विषय में निष्णात सुमित्रा को  स्त्री इनसायक्लोपीडीया भी कहा जाता था।  तेजस्वी नोट करती कि उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट भी अतिरिक्त नहीं होती थी , बल्कि शायद उसने उन्हें कभी मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था।  स्त्रियों से जुडी शिकायतों में वे हमेशा स्त्री के पक्ष में ही रहती।  इस मामले में उन्हें जरा भी लापरवाही पसंद नहीं थी। यदि किसी भी रिपोर्ट में स्त्री पर  आरोप सही  साबित होने की स्थिति में होता  , तब वे उस पर गहन  छानबीन करती ,कई फेरबदल करवाती  , यहाँ तक कि कई बार रिपोर्ट ख़ारिज ही कर देती।


कानून की अवधारणा की तर्ज पर ही उनका अजेंडा था कि कई दोषी स्त्रियां बच निकलें तो कोई बात नहीं , मगर एक भी निर्दोष स्त्री  उपेक्षा अथवा  गलतबयानी की शिकार न हो। उनके स्त्रियों  से जुड़े मामलों पर  अतिवादी रुख तथा  तीव्र प्रतिक्रिया से  आतंकित पुरुष साथी घबराये से रहते। उनके सौंपे गए कार्य  जल्दी से निपटाकर भागने की कोशिश में रहते। पीठ पीछे लोग उन्हें हिटलर अथवा कुंठित स्त्री का खिताब देते नजर आते , यहाँ तक कि  सिमरन भी अन्य साथियों के साथ मिलकर अक्सर सुचित्रा का उपहास करती   हालाँकि उनके सामने कुछ कहने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती थी।  कभी -कभी इस छींटाकशी से   तेजस्वी व्यथित भी होती। वह मानती  थी  कि  उनके इस रूखे व्यवहार के पीछे कुछ तो गम्भीर वजह अवश्य रही होगी।

एक दिन अपने केबिन में उन्हें अकेला पाकर उनके सामने की कुर्सी पर डट गयी।  
सुचित्रा का रुखा सा प्रश्न  था - कुछ काम था मुझसे !
नहीं , बस यूँ ही। आपको अकेले देखा तो बात करने की इच्छा हुई।

 मन में सोच रही थी तेजस्वी कि सख्त मिजाज लोगों के आँखों पर चश्मा ना हो तो उनका सामना बड़ा मुश्किल  हो जाता है।

क्यों , आज तुम्हे कोई काम नहीं है! 
थोडा ही बाकी है। क्या आप कभी हंसती मुस्कुराती नहीं है !
उनके रूखेपन को नजरअंदाज करते हुए तेजस्वी ने कहा।

मैं ऑफिस काम करने के लिए आती हूँ ,  यह कोई मनोरंजन का स्थान नहीं है , जहाँ हंसी -मजाक  कर दिल बहलाया जाए। 
नहीं … मतलब काम तो किया जाना चाहिए … मगर  … बस ऐसे ही … आपको कभी हँसते नहीं देखा … बस इसलिए ही  … अटकते ,झिझकते , डरते तेजस्वी ने कह ही दिया।

अपने काम से काम रखने की सलाह देने की मंशा रखते हुए  सुचित्रा ने एक बार गम्भीर मुद्रा में उसकी ओर  देखा। मगर तेजस्वी के भोले सहमे चेहरे और कागज-पेन  को हाथ में पकड़कर भागने की मुद्रा में देख  रोकते रुकते भी सुचित्रा के मुख पर हलकी-सी मुस्कान आ ही गयी। 

अरे बाबा , मैं हंसती भी हूँ और मुस्कुराती  भी हूँ , मगर उचित कारणो से ही।  बेवजह हंसी -दिल्लगी में मेरी कोई रूचि नहीं है।  तुम्हारी रिपोर्ट कहाँ तक पहुंची , तुम्हे पता है न मुझे काम समय पर चाहिए।

जी , रिपोर्ट लगभग पूरी हो चुकी है , कुछ थोडा- सा कार्य ही अभी बाकी है।

सुचित्रा के रूखे रौबीले व्यवहार से थोडा आहत होते हुए  तेजस्वी को सुखद अनुभूति भी हुई। उसने सुचित्रा को मुस्कुराते हुए देखा  और आँखों में छिपी कही स्नेह की छाया भी अवतरित हुई।

विरोधाभास मूलतः इंसानी प्रवृति ही नहीं , प्रकृति में ही निहित है. बर्फ से ढकी चादर से ढका है गुनगुने पानी का अस्तित्व , नारियल के सख्त आवरण में है सफ़ेद झख मुलायम गिरी , कछुए के कड़े खोल में छिपा है एक नरम वजूद ।  सुचित्रा  और तेजस्वी भी इसी विरोधाभाषी व्यक्तित्व अथवा अनुभूति की प्रतीक दिख पड़ी।

अगले दिन तेजस्वी ऑफिस में पहुंची तो फिजां में तनाव साफ़ नजर आ रहा था। सुचित्रा आज समय से पहले ऑफिस में मौजूद थी।  फक्क पड़े कुछ चेहरों को देखते डेस्क तक पहुची तेजस्वी तो सिमरन   दोनों हाथ बांधे विचारमग्न मुद्रा में खड़ी नजर आई.

मैं यह ऑफिस छोड़ रही हूँ।  
क्यों , क्या हुआ , ऐसे अचानक , तेजस्वी परेशान थी। 
कारण तो तू  सुचित्रा से ही पूछ लेना  , बस तुझे विदा कहने को ही रुकी थी। मुझे जल्दी ही कहीं जाना है।  तेजस्वी की किसी भी प्रतिक्रिया का  इन्तजार किये  बगैर ही सिमरन तीर की तरह दरवाजे से बाहर निकल गयी।

अगले ही पल तेजस्वी सुचित्रा के केबिन में थी। 
मैम , सिमरन ऑफिस छोड़ कर जा रही है , ऐसा क्या हुआ। उसके चेहरे पर उलझन , खिन्नता , परेशानी स्पष्ट पढ़ी जा सकती थी। 
सुचित्रा ने अपनी उसी सख्त रौबदार मुद्रा में उसे बैठने का इशारा करते हुए एक कागज उसके सामने  बढ़ा दिया। 
हलकी सी सिहरन के साथ कागज़ सँभालते तेजस्वी की आँखें तरल हो आई थी।  वह कागज सिमरन के "सुकेत  एक्टिविस्ट" होने की पुष्टि कर रहा था।

क्या तुम्हे पता नहीं है , इस ग्रुप से सम्बन्ध रखने वाले किसी व्यक्ति को हम अपने विभाग में नियुक्ति नहीं दे सकते हैं। यह एक्टिविस्ट ग्रुप हमारे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मिडिया कम्पनी का ही एक हिस्सा है।

मुझे इस सम्बन्ध  में कोई जानकारी नहीं है, जैसा कि आप जानती है यह  मेरा पहला कार्य ही है।

जिसे किसी प्रोजेक्ट में आप साथ लेते हैं , मित्र बनाते हैं , उसकी जानकारी तो आपको होनी चाहिए। सञ्चालन दृष्टि से दृश्य -श्रव्य माध्यम किसी भी तरह कॉर्पोरेट संस्था से भिन्न नहीं है,  यहाँ भी उतनी ही सतर्कता आवश्यक है।  तुम्हे इसका ध्यान रखना चाहिए था।

सुचित्रा के कमरे से निकलते तेजस्वी अनमयस्क सी थी।  उसने फ़ोन मिलाया सिमरन को ," तूने अपने एक्टिविस्ट होने की बात मुझसे क्यूँ छिपाई। 
मैंने कुछ नहीं छिपाया , मुझे स्वयं ही नहीं पता कि कब उन्होंने मुझे सदस्य बना लिया . मैं मना  कर पाती , इससे पहले ही मेरा नाम सार्वजानिक कर  दिया गया। चल , मैं तुझसे बाद में बात करती हूँ।  
सिमरन ने  बड़ी बेरुखी से अपनी बात समाप्त करते हुए फोन काट दिया।

तेजस्वी अचानक हुए इस घटनाक्रम से बुरी तरह परेशान थी।  शक्ति सदन की उसकी रिपोर्ट भी अधूरी पड़ी थी , उससे सम्बधित  सामग्री भी सिमरन के पास ही थी। उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। बेखयाली में दो- तीन दिन गुजर गए , मगर उसका कार्य पूरा नहीं था।  अनुशासन की पाबंद सुचित्रा समय में लापरवाही और छूट बर्दाश्त नहीं कर सकती थी, उसने तेजस्वी को इस प्रोजेक्ट  से अलग कर दिया।
अपने पहले बड़े प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ने की कसक तेजस्वी के चेहरे और  कार्यशैली पर स्पष्ट नजर आती थी।  मगर आलिया का व्यवहार अब भी उसके साथ स्नेहपूर्ण ही था। आलिया के निर्देशानुसार अब उसे भारतीय संस्कृति, परंपरा  ,व्रत- त्योहार जैसे विषय पर कार्य प्रारम्भ करना था मगर तेजस्वी का उत्साह क्षीण हो चुका  था।
 कई बार  स्वयं को समझाती तेजस्वी अपने कार्य में मन लगाने का भरपूर प्रयास करती। समय अपनी रफ़्तार से बीतता ही है , मनःस्थिति किस प्रकार  की भी हो। 

 कुछ समय बीते  एक दिन सुचित्रा के केबिन के आगे से गुजरते चिरपरिचित आवाज ने उसके क़दमों को रोक लिया।  केबिन में  झाँक कर देखा तो उसकी हैरानी और ख़ुशी का  ठिकाना न था।  सुचित्रा के सामने कुर्सी पर बैठी सिमरन बहुत बेतकल्लुफी से आपस में विमर्श कर रही थी। उसने दोनों को टोका नहीं और अपनी सीट पर लौट आई।
 उस दिन के  बाद सिमरन से उसकी बात भी नहीं हो पाई थी।    उसे  पूरा यकीन था कि सिमरन तेजस्वी से मिलकर ही  जायेगी , बल्कि तेजस्वी को गहन उत्सुकता थी कि नाराजगी में संस्थान छोड़ने वाली सिमरन को सुचित्रा से आखिर क्या काम रहा होगा। सिमरन का इन्तजार करते अपने काम से फारिग होकर नजरें उठाई  तो अचानक ही सामने से अनजान बन कर गुजरती सिमरन पर उसकी नजर पड़  गई। उसने पीछे से पुकारा भी मगर जाने उसकी आवाज सिमरन के कान तक नहीं पहुंची अथवा उसने जानबूझकर नहीं सुना।

 तेजस्वी देर तक  अजीबोगरीब व्यवहार पर  सोचती रही मगर उसे कोई  सिरा नजर नहीं आया।  उसने सर झटक कर कई बार स्वयं को समझाया शायद  जल्दी में रही होगी , कोई आवश्यक कार्य रहा होगा , सोचते उसका सिर  भारी हो गया।

इसी उधेड़बुन के बीच घर पहुंची  तो माँ सजी- धजी सीमा की  मेहंदी और  महिला संगीत में जाने के लिए तैयार उसका इन्तजार कर रही थी।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

प्रजा मस्त , राजा पस्त ....


राजा  के राज्य में हर ओर अमन चैन था।  अच्छी बरसात ने झीलों  ,कुओं और तालाबों को लबालब  कर दिया , फसलों की हरियाली लुभावनी थी. गायों और भैंसों को ताजा हरा चारा प्राप्त था , शुद्ध दूध, दही ,घी प्रचुर मात्रा  में उपलब्ध था।  प्रजा  को  ताजा फल ,हरी सब्जियां ,  अनाज भी उपयुक्त कीमत पर मिल रहे थे लिहाज़ा अच्छी खासी सेहत के साथ कोई भूखा नंगा नहीं था।  खेत , व्यवसाय , उद्योग और राजकीय कार्य में व्यस्त प्रजा को मनोरंजन के तमाम विकल्प भी उपलब्ध थे।  हर और ख़ुशी का साम्राज्य था। सुबह शाम खुशनुमा हुए जा रहे थे , प्रजा अपने कार्य करती , मनोरंजन करती , खाती पीती  सोती और जागती।  

मंदिर ,मस्जिद , गुरूद्वारे ,गिरिजाघर  में समय पर झालर, घंटे ,  मंजीरों और नियमानुसार समय से होने वाली आरती , प्रार्थनाओं  ने ईश्वर को विसराने  ना दिया , मगर धीरे- धीरे राजा के महल में फरियादों की संख्या नगण्य हो गई। 

महल के बाहर टंगे घंटे ने जाने कब से टंकार नहीं सुनाई , राजा की जय हो , न्याय की विजय हो ,भी कानों में सुन नहीं पड़ते और  ना ही प्रजा में राजा की दयालुता के चर्चे। सत्ता के केंद्र का आकर्षण बने राजा के कानों  को याचना और प्रशंसा की कमी खलने लगी।  वह कैसा राजा जिसे दयालुता दिखने का मौका ना मिले , न्याय -अन्याय की तराजू पर अपने फैसलों पर  प्रजा की  जयकार सुनने अवसर ना मिले। 

राजा के कानों में सरसराहट होने लगती। बार -बार लगता कोई पुकार रहा है , मगर दूर -दूर तक कोई नहीं।  कान थपथपाकर कर  दोनों सिरे खिंच कर सुनने का प्रयास करता , मगर कोई लाभ नहीं।  जैसे -जैसे समय बीतता गया , कानों में खुजली  बढ़ने लगी।  बात करते , खाते पीते , सोते जागते राजा के हाथ कानों पर।   राजा  की इस परेशानी को रानियों ने ,दासियों ने  दरबारियों ने , सबने देखा , महसूस किया।  आखिर राजवैद्य जी  को बुलाया गया।  वैद्य ने हर प्रकार से निरीक्षण  कर जाना कि बीमारी तन की नहीं , मन की थी। राजवैद्य ने राज ज्योतिषी की सलाह ली और बीमारी के निराकरण हेतु प्रजा की सेवा करने , गरीबों को  वस्त्र , अनाज , आभूषण आदि दान करने तथा अनाथालय /चिकत्सालय  आदि  के निर्माण  का उपाय सुझाया गया। 

राजा ने दरबारियों से मशवरा किया और गरीबों , अनाथों , बीमारों को दरबार में उपस्थित होने को कहा , मगर यह क्या।  राज्य में कोई गरीब , अनाथ अथवा मरीज न था।  दरबार में फरियादी का स्थान खाली का खाली। राजा की खुजली दिन बी दिन बढ़ती ही जाए। 
राजा की व्यग्रता देखकर कुछ वरिष्ठ मंत्रियों ,दरबारियों ने मिल कर फैसला लिया , राज्य में कर बढ़ा दिए गए , खेतों में खड़ी फसलों को  गौशाला और अश्वशाला के निवासियों के सुपुर्द कर दिया गया , सर्दी में जल रहे अलाव की अग्नि रहस्मय रूप से खलिहानों तक पहुँच गयी।  प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी। कुछ ही दिनों में कंगाल/ गरीबों और मरीजों की संख्या बढ़ती गयी। प्रजा के दुखों का भार बढ़ते राजा के महल तक जा पहुंचा।  आये दिन महल के बाहर बने घंटे की टंकार सुनाई देती रहती। राजा  के कानों की खुजली और सरसराहट कम होने लगी। 
 फरियादी की बढ़ती संख्या देख शासन ने मुनादी करवाई , राजा प्रति सप्ताह गरीबों को अपने हाथों से अन्न , वस्त्र , दवा आदि  दान करेंगे। जिस तरह राजा दान करते , उसी तरह जनता पर कर की दर बढ़ा दी जाती। कर बढ़ते , प्रजा व्यथित  होती ,राजा दान करते , प्रजा राजा की दयालुता की सरहाना करते हुए अति विनम्रता से दान ग्रहण करती।  

चतुर दरबारियों ने राजा के कानों की खुजली का स्थाई इलाज़ ढूंढ निकाला।  राजा अब सदा के लिए स्वस्थ था।  

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ….. (2 )

अब तक .... 





खूबसूरत  स्वप्निल  सुबह में माँ की आवाज़ से नींद टूटी तेजस्वी की , क्या समय है आज ऑफिस जाने का। 
"ओह ! माँ ,सपनों में जाने कहाँ दौड़ती -उड़ती -फिरती रही रात भर मैं  "

चादर एक तरफ फेंक पैर में चप्पलें फंसाती सी  बाथरूम की और भागी।  नहा धोकर तैयार हुई तो माँ नाश्ते के साथ दही बताशा चम्मच में भरे खड़ी  थी।

घर से निकलते  पिता की स्नेहिल ऑंखें  सिर्फ इतना ही कह पाई "अपना ध्यान रखना "! 
 वहीँ माँ की सैकड़ों हिदायतें , ध्यान से जाना , हेलमेट जरुर लगा लेना ,  मोबाइल चेक करती रहना ....
तेजस्वी  सोच कर मुस्कुराती है   जब फोन इतने आसानी से उपलब्ध नहीं थे , माओं का गुजारा  कैसे होता होगा , कही पहुँचों तो कॉल करो , रवाना हो रहे हो तो कॉल करो , और यदि किसी कारणवश फोन नहीं  पाये तो घर पहुँचते जाने  कितने दोस्तों के पास फोन पहुँच जाए।  कई बार झुंझलाती है तेजस्वी कि क्या है ये माँ ,  घर ही तो आ रही थी , सब  दोस्त हँसते हैं मुझ पर , मैत्रेयी तो अधिक ही। उसके घर से कभी फोन नहीं आता , न वह करती है। 
माँ कहती है मन ही मन कभी गुस्से से , कभी खिन्न हो कर तो कभी हँसते हुए - माँ बनोगे तो जानोगे।

 एक दिन बहुत हंसती हुई  लौटी घर " पता है माँ , आज  मैत्रेयी की  मम्मी का दो बार फोन आया" . 
 क्यों ? 
 शुक्रवार की शाम घर लौटते उसका छोटा- सा एक्सीडेंट  हो गया था,  आंटी इतना डर गई कि दिन भर  फोन कर हालचाल लेती रही। 
 अब समझ आया न , क्यों चिंता रहती है हमें।

उसके बाद एक परिवर्तन आया तेजस्वी में , देर होने की सम्भावना में माँ को फ़ोन जरुर कर देती। 

वाईब्रेंट  मीडिआ हाउस में उसका पहला दिन उत्साह  भरा था। सबसे पहला काम उसे आलिया के साथ करना था। हंसमुख स्वाभाव की आलिया से मिलकर उसे बहुत अच्छा लगा।  दरम्याना कद , कंधे तक बाल , आँखों पर ऐनक  उसे उम्र के अनुसार परिपक्व बनाती मगर चेहरे पर शरारती मुस्कान और बच्चों सी खिलखिलाहट , उसके लिए अपने मातहतों  से जुड़ने में कोई बाधा नहीं पहुंचाती । 
आलियां ने  प्यार भरी मुस्कराहट से  तेजस्वी का स्वागत किया  और एक सादा कागज़ और पेन उसके सामने रख दिया .

तुम्हारा बायोडाटा देखा , तुम शेरो -शायरी कवितायेँ आदि लिखती हो , कुछ लिखो इस पर।

कुछ ज्यादा नहीं लिखती हूँ , बस यूँ ही कभी कभी डायरी में , कभी किसी को सुनाई भी , सहेलियों ने छीनकर पढ़ ली बस।

सकुचा गयी तेजस्वी. कभी किसी झोंक में डायरी में  लिखना अलग बात मगर यूँ अचानक लिखने का इसरार  दे तो ठिठकन  स्वाभाविक ही  लगती है . 

कोई बात नहीं , कुछ भी लिखो , जो तुम्हारा  दिल करे !

सुबह  की खिलती मुस्कुराती धूप  में 
फूलों पर शबनम के कतरे   
गोया  कि चाँदनी  ने 
रात भर आंसू बहाये हों। 

मैं ग़र गुल हूँ तो वह नहीं 
जो सदाबहार है 
मुझे तो चंद  लम्हों में मुरझाना है 
मैं ग़र खार हूँ तो वह नहीं 
जो ग़ुलों का हिफ़ाज़ती है 
मैं वह ख़ार हूँ जो हरदम 
आँखों में खटका  हूँ !

अपनी डायरी के पहले पन्ने  पर लिखी अपनी यही पंक्तियाँ उसे याद आई। 
कागज़ पर लिखे अक्षर पढ़ते हुए आलिया ने चश्मे के पीछे गहरी आँखों से देखा उसे !
पढ़कर भी सुना दो अब !
ग़र , ग़ुल , ख़ार जैसे शब्दों पर उसके पढ़ने पर बुरी तरह चौंकी आलिया।  
उसका बायो डाटा फिर से पढ़ा।

संस्कृत तुम्हारा अतिरिक्त विषय रहा है।  फिर तुमने यह ज़बान  कहाँ सीखी , इतना  साफ़ लहज़ा तो यह विषय पढ़ने वाले भी नहीं बोल पाते कई बार। अचंभित भी थी  आलिया !

पता नहीं ,   बस ग़ज़ल सुनने का शौक रहा है ,शायद वहीं !

हम्म्म .... मगर फिर भी। अब भी अचरज में थी आलिया।  

हर व्यक्ति के जीवन में बहुत कुछ बेवजह भी होता है। जीवन सफ़र में कुछ सामान्य पल ,  विषय और लोग  यूँ भी चौंकाते हैं। 

स्त्रियों से जुड़ी  न्यूज़ चैनल्स की बाईट्स , अख़बारों के समाचारों के संकलन का निर्देश देते हुए आलिया ने उसे पत्रकारों  के लिए जरुरी दिशा निर्देश पुस्तिका भी थमा  दी। 

इसे भी ध्यान से पढ़ना , तुम्हे काम करने और समझने में आसानी होगी। 

 तेजस्वी  कुछ अलग करना चाहती थी  , उसे कुछ  मायूसी हुई।  उसने वैदेही को भी अपने पसंदीदा विषय का संकेत दे दिया था।  जो भी हो , मगर उसे कार्य तो यही करना था  और उससे  पहले उसे ट्रेनी की वर्कशॉप ज्वाइन करनी थी।
वर्कशॉप में मिडिया हॉउस के वरिष्ठ  उपसंपादकों और तकनीकी जानकारों ने  सूचनाओं को  समाचारों  में बदलने की बारीकिया और कंप्यूटर से जुडी बहुत  तकनीकी जानकारियां साझा की।  
याद रखिये,  पत्रकारों का कार्य  निष्पक्ष होकर सूचनाएं एकत्रित करना और उन्हें आगे  बढ़ाना है .  उन्हें गलत या सही साबित नहीं करना है, वह कार्य पाठकों अथवा दर्शकों को अपने विवेक अनुसार करने देना है।    सूचनाओं  को  एकांगी अथवा पूर्वाग्रही न होने देने के लिए भावनाओं और संवदनाओं पर काबू रखना है। 

वरिष्ठ उपसम्पादक नरोत्तम धौलिया अपने समापन आख्यान में सम्बोधित कर रहे थे। 

आंदोलनों , लाठी चार्ज , दुर्घटनाओं , बम विस्फोटों और विभिन्न आपदाओं के चित्र तेजस्वी की आँखों के  सामने से  गुजर गए।  यह ख्याल उसे कई बार आता रहा था कि उन स्थानों पर  उपस्थित रिपोर्टर्स के लिए कितना मुश्किल रहा होगा , किस प्रकार उन्होंने अपने जज्बातों पर काबू पाया होगा।   उसे हॉस्पिटल में मरीजों से घिरे चिकित्सकों , नर्सों का भी ख्याल आता था , यदि वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित ना कर सकें तो उनका कार्य कितना मुश्किल हो जाए। 
वर्कशॉप में ही उसकी पहचान कुछ और नए ट्रेनियों से भी हुई ,  सिमरन , शौर्य ,मयंक , अमिता।  समवयस्क होने के कारण वे सब जल्दी ही आपस में घुल मिल गये। अपनी डेस्क तक पहुँचते बेतकल्लुफी इतनी हो गयी कि आपस का परिचय आप से तुम और तू तक पहुच गया। तेजस्वी ने डेस्क पर  पहुचते ही सबसे पहले कंप्यूटर डेस्क और आस पास का जायजा लिया।   एक लाईन में बने पार्टीशन वाले केबिन में  अपने कम्यूटर पर झुके  मुस्तैद साथियों को आस पास की खबर नहीं थी । उसके साथी  भी  अपनी डेस्क में समा  चुके  थे।  तेजस्वी ने भी स्वयं को अपने कार्य पर ध्यान केंद्रित किया   अख़बारों और न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट खंगालने लगी। 

इंदिरा नूई अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका फॉर्च्यून के 500 मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की सूची में शामिल 18 महिलाओं में जगह बनाने में कामयाब रही हैं। वान्या  मिश्रा  मिस इंडिया वार्ड  चुनी गयी। प्रथम पृष्ठ के मुख्य समाचारों में स्त्रियों की कामयाबी से उत्साहित तेजस्वी तेजी से ख़बरें पलटने  लगी।  
 कूड़े के ढेर से नवजात बच्ची का शव बरामद किया गया ,  छह वर्ष की बच्ची घायल अवस्था में मिली ,    हॉस्टल में छात्रा  के गर्भवती होने  की खबर पर वार्डन तलब , महिला ने तीन बच्चों सहित कुएं में कूद कर जान दे दी. 
क्या आम स्त्रियों से जुडी कोई अच्छी खबर नहीं मिलेगी उसे , वह इन जीवित या मृत लड़कियों या स्त्रियों से समाचारों में ही मिल रही थी , इनसे वास्तविकता में आमने -सामने मिलना कैसा रहेगा ,तेजस्वी को लगने लगा था कि उसका काम इतना आसान नहीं  रहने वाला है।  

 यह तो चुनौतियों की दस्तक मात्र ही थी।

घर पहुचते शाम गहरा गयी थी। फ्लैट की सीढियाँ चढ़ते मिसेज वालिया  टकरा गयी , नाटे कद की सांवली रंगत वाली मिसेज वालिया सरकारी विद्यालाय  में हेडमिस्ट्रेस थी।  मगर कॉलोनी के सम्बन्ध में उनकी जानकारी किसी  पत्रकार या जासूस से कम नहीं थी। किसकी लड़की किसके साथ कब आई , कौन सी पड़ोसन ने बालकनी में  कपडे सुखाते किस पडोसी की खिड़की की ओर झाँका , किस पडोसी का दूसरे पडोसी से अबोला है।  अपनी काम  वाली बाई की बदौलत उन्हें सबकी खबर रहती थी। सूचनाएँ  निकलवाते समय उनकी उदारता चरम पर होती थी , और बाई भी इसका पूरा फायदा उठाती।  उनका शहर अभी इतना बड़ा महानगर नहीं था कि लोग आसपास रहने वालों से अनजान रहे। 
" वो छोटी बेबी की छींटदार सलवार कमीज तार से उतारते समय उलझ गयी थी , आपकी साडी का तार खीच गया था  " फुर्सत में उनको सुधार कर फिर से उपयोग में लेने की धुन चटपटी ख़बरों के चटखारों में जाने कहां बिला  जाती और वे जल्दी - जल्दी  सर हिलाते हुए हामी भर लेती।

तेजस्वी कई बार माँ से चर्चा करती ,  पढ़ीलिखी कामकाजी स्त्रियों  को भी  बातों के चटखारे लेने की  आदत नहीं छूटती। जाने  कितनी  बार माँ को ताना दिया होगा उन्होंने , आपका अच्छा है ,  दिन भर घर में रहती हैं , हमें तो समय ही नहीं मिलता आसपास की खबर रखने का  , आपका तो अच्छा टाईम पास हो जाता है , हमें कहाँ फुर्सत,  कहते हुए भी  दो -चार पड़ोसनों का हाल बताये बिना नहीं खिसकती।

तेजस्वी भुनभुनाती  है माँ  पर , कभी मैं इन्हे  खरी खोटी न सुना दूं , घरेलू स्त्री होने का मतलब सिर्फ टाईम पास करना नहीं है , मिसेज आहूजा को  कॉलोनी की ताजा खबर तो खूब होगी ,   देश दुनिया की कोई खबर मालूम करने की कोशिश भी की है कभी , कभी अखबार हाथ में उठाकर देखा भी होगा , कभी किसी गरीब बच्चे को पढ़ाने  की कोशिश की है , क्या  मुकाबला करेंगी मेरी माँ से , बड़ी आई। पता नहीं स्कूल में बच्चो को क्या पढ़ाती होंगी।  हुंह !

माँ  हंस देती है , छोडो भी , क्यूँ उलझना !

अभिवादन का इन्तजार किये बिना ही  मिसेज वालिया  पूछ बैठी  "कैसी हो तेजस्वी !"

शिष्टाचार वश तेजस्वी को  रुकना ही पड़ा " अच्छी हूँ आंटी , आप कैसे हो ? सीमा कैसी है , बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ ". 

हाँ , तुम भी पता नहीं कहाँ व्यस्त रहती हो , अब जाकर घर पहुंची हो। 22 मार्च को सीमा की शादी तय कर दी है , लड़का दिल्ली का रहने वाला है , बहुत पैसे वाले हैं।  सीमा को देखते ही पसंद कर लिया। 

ओह , अच्छा।  बहुत बधाई आपको , मगर मार्च में  सीमा के फायनल ईअर की परीक्षाएं भी तो है। 

होती रहेगी परीक्षा तो , अच्छा लड़का मिला तो कर दी शादी तय , वर्ना आगे जाकर बहुत मुश्किल हो जाती है।

चलती हूँ आंटी , बहुत थक गयी हूँ।  कल मिलती हूँ सीमा से ! कहते हुए तेजस्वी तेजी से अपने फ़्लैट की ओर लपक ली। 

क्रमशः .... 


चित्र गूगल से साभार लिया गया है , आपत्ति होने पर हटा दिया जाएगा !

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ......(1)




करीने से सजा कर रखे गए लाल बड़े अक्षरों से लिखा नाम " वायब्रेंट मिडिया हाऊस  " . शीशे की पारदर्शी दीवारों से झांकती अन्तःसज्जा  …  राह चलते कितनी बार कदम रुके होंगे , कितनी बार चीते की खाल जैसे चित्रकारी से सजी अपनी स्कूटी  को रोका होगा उसने  !


कब से संजों रखा था सपना उसने किसी दिन इस ऑफिस में बतौर संपादक नहीं तो , पत्रकार या कर्मचारी के रूप में ही सही  . बड़े घोटालों के खुलासे , सफेदपोशों के काले कारनामे , अन्याय के विरुद्ध डट कर खड़े रहना ,  जाने  कब ख़बरों  ही ख़बरों में वह इस हाउस से जुड़ गयी थी और जब अपने लिए करियर चुनने  का अवसर आया तब उसने यही अपनाया।  

घर में सबने टोका , बहुत मुश्किल है यह लड़कियों के लिए , क्यों पड़ती हो झंझट में।  पत्रकारिता में क्या है ,  लिखो घर सजाने के बारे में , परिवारों को एकजुट रखने के बारे में , अच्छा खाना बनाने की टिप्स , सौंदर्य और ग्लैमर की दुनिया के बारे में जानकारी देना , कविता , कहानियां भी लिखती हो , क्या यह काफी नहीं है ....
कोई समझाता विस्तृत आकाश है तुम्हारे सामने  , तुम्हे  पत्रकार ही क्यों बनना है ! कितना खतरा है इसमें और तुम लड़की  जात , कैसे करोगी सामना !
परिजनों की चिंता स्वाभाविक थी। 

जैसे और लड़कियां कर रही हैं , तुमने नहीं देखा मेघा , निष्ठा  को। कितना आत्मविश्वास है उसमे।  कितनी बेबाकी से भ्रष्ट राजीनीति , अफसरशाही , कालाबाजारी , घोटालों पर लिखती है , आज लड़कियां कहाँ नहीं हैं , क्या नहीं कर रही हैं , पुलिस ,सेना ,गुप्तचर विभाग , वकालत और जाने क्या क्या , क्या उनका परिवार नहीं है  , तुम नाहक फ़िक्र क्यों करती हो।
माँ के गले में बांहे डाल  उसे आश्वस्त करने की कोशिश करती।

मीडिया  हाउस में ऊर्जावान पत्रकारों की   नयी भर्तियों के बारे में जैसे ही  पता चला , वह मिली उत्कल से  . उत्कल और तेजस्वी  पडोसी और सहपाठी होने के कारण अच्छे मित्र भी थे। बारिश के पानी  में साथ कुलांचे भरने , नाव बहाने से से लेकर स्कूल के पास सटे मूंगफली और मूली के खेतों में सेंधमारी तक के कार्य उन्होंने एक साथ ही किये थे।  माध्यमिक विद्यालय तक आते दोनों के विद्यालय बदल गए . उत्कल के पिता कई प्रमोशन पा कर अपने विभाग के उच्चाधिकारी बन चुके थे , हर प्रमोशन के साथ ही उनका रहन -सहन उच्च से उच्चतर होता गया , उत्कल की माँ सोने से लदती  गयी , गैरेज में खड़े दुपहिया का स्थान महंगे  चौपहिया ने ले लिए ,गाड़ियां महँगी होती गयी  और इसी अदला बदली में उत्कल सरकारी विद्यालय से प्रमोट होकर सबसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित  अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय का विद्यार्थी हो गया।  तेजस्वी और उसके परिवार के साथ  उसके  व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ , हालाँकि उत्कल के माता- पिता जब तब अपने रुतबे का शंख बजाये बिना नहीं रहते।
 इंजीनियरिंग की पढ़ाई  पूरी कर  उत्कल शहर के ही जाने माने संस्थान   से जुड़  चूका था , तेजस्वी  अपनी पढ़ाई पूरी कर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं  का सामना करते हुए अपने सपने को पाल रही थी।   उत्कल भी  विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही  उसके सपने पूर्ण करने में अपनी सलाह और प्रेरणा देना नहीं भूलता।   उत्कल ने ही मीडिया हॉउस की चीफ एडिटर का पता देते हुए उसे सलाह दी कि आवेदन करने से पहले वह पहले एक बार उससे मिल ले। उसके बाद ही अपना आवेदन दाखिल करे। 
परिचय से लेकर साक्षात्कार तक उसका आत्मविश्वास कई बार डगमगाया।  बॉब कट हेअर   स्टायल और मिनी स्कर्ट वाली फॉर्मल आउटफिटमें टाइटफिटेड माला ने उसे ऊपर से नीचे आँख भर देखा तो वह एक बार सकपका गयी।  उसने भी खुद पर एक नजर डाली , सलवार कमीज पर  लापरवाही से ओढ़ा स्टोल और रूखे बालों में गुंथी हुई चोटी ।  खुद को कोसा उसने , कम से  कम बाल खुले ही रख लेती , मगर घबराहट को छिपाते हुए चेहरे पर आत्मविश्वासी मुस्कान लाने में कामयाब हो ही गई 

 बात यही ख़त्म नहीं हुई , धड़धड़ाती अंग्रेजी में पूछे गए माला के सवालों ने फिर से उसके दिल की धड़कने बढ़ा दी।  अंग्रेजी ज्ञान बुरा नहीं  था उसका , मगर  हिंदी माध्यम से ली गयी शिक्षा पटर पटर अंग्रेजी बोलने पर अंकुश लगा देती।  उसने धीमे शब्दों में अपना परिचय देते हुए अपने आने का मकसद बताया।  

ओहो , पत्रकार बनने आई हो ,होठों को तिरछा कर भीषण हंसी को रोकते माला ने  हिंदी में ही कहा । चोर  नजरों से तेजस्वी ने देखा ,उसके पास ही खड़े एक कर्मचारी के होठों पर भी  तीव्र मुस्कराहट थी।  गले में लटके बैज पर नाम भी देखा उसने -साहिल  मिश्रा !

तेजस्वी ने एक गहरी सांस ली और अपने सपने को याद किया।
जी हाँ ! वैदेही  मैम कब और  कहाँ मिलेंगी। तन कर खड़े रहते उसने जवाब दिया.
वैदेही के नाम से माला  कुछ संयत हुई।  कार्य के प्रति अपने समर्पण के साथ ही बेबाकी और साहस के लिए जाने जाने वाली  अनुशासनप्रिय उपसम्पादक  वैदेही का अपना रुतबा था.
माला से  केबिन का पता लेकर  चल पड़ी तेजस्वी वैदेही से मिलने ।  
वैदेही उससे बड़े प्यार  से मिली , उत्कल ने उसे तेजस्वी के बारे में बता दिया था। उसकी शैक्षणिक योग्यता के साथ ही  उसके पसंदीदा विषय को भी जानना चाहा .

 तुम्हे  किस विषय पर लिखना अधिक पसंद है.

देश की  सामाजिक , राजनैतिक और प्रशासनिक  व्यवस्था पर  चिंतन और बेबाक लेखन मुझे बहुत पसंद है। 

स्त्री सशक्तिकरण अथवा स्त्रियों से ही जुड़े अन्य मुद्दों में तुम्हारी  रूचि नहीं है ? वैदेही का चौंकना लाज़िमी था !

सामाजिक व्यवस्था मतलब नारी नहीं हुआ !

हम्म्म्म  …मगर जैसी हमारी सामाजिक व्यवस्था है , उसमे स्त्री एक  कमजोर पक्ष मानी जाती है. उसे विशेष संरक्षण , सहानुभूति , देखभाल की आवश्यकता है।

मैं समाज के प्रत्येक अंग के चिंतन ,विकास और संरक्षण पर ध्यान देना और दिलाना चाहूंगी। 
तेजस्वी को अपनी चोंच से अंडे का खोल फोड़ कर बाहर आने वाली चिड़िया की कहानी याद थी. 

वैदेही ने उसे आवेदन और चयन की कार्यविधि समझाई। 

तेजस्वी मानती रही है कि खूबसूरती   देखने वाले की  आँखों में होती है , यह सिर्फ इंसान पर ही लागू होता है . घर में  उसकी भाई बहन से कई बार कहा सुनी हो जाती. उसकी टेबल को कोई हाथ ना लगाये , जो चीज जहाँ से ली वहीं  रखे . कई बार माँ  समझाती भी उसे - थोडा इग्नोर भी किया करो ,मगर  उसे  घर , स्टडी टेबल , ऑफिस  सब व्यवस्थित ही चाहिए।
जब उसे सुन्दर रंगों और शीशे से घिरे व्यवस्थित केबिन से सजा धजा ऑफिस अपने कार्यक्षेत्र के लिए मिला  तो उसकी प्रसन्नता  का ठिकाना ही नहीं था। उसका सपना सच होने जा रहा था !


क्रमशः .... 


चित्र गूगल से साभार लिया गया है , आपत्ति होने पर हटा दिया जाएगा !

सोमवार, 11 नवंबर 2013

" श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ"



 यमुना के तट वंशी बजाये , कालिया नाग को नाच नचाये , कंस को उस लोक पठाये , राधा -रुक्मिणी -मीरा के मन में समाये, सुदामा -अर्जुन- द्रौपदी के सखा कहाये  । मानव जीवन के  प्रत्येक सोपान यानि उम्र की सीढियाँ चढ़ते हुए कितने ही प्रतिमान बनाये।  धरती पर प्रेम की सभी सम्पूर्ण अवस्थाओं  को रस ले- ले निभाया . कृष्ण ने युगों  तक इस धरती के लिए प्रेम की व्याख्याएं गढ़ी नहीं बल्कि अपनाकर(जी) कर  दिखाई।  
हिंदी पंचांग में हिंदुओं के लिए पवित्र कार्तिक मास  का बहुत महत्व है।  राधा -दामोदर को समर्पित इस पवित्र कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में विभिन्न तिथियों ( कार्तिक षष्ठी , गोपाष्टमी , आँवला नवमी ,वैकुण्ठ चतुर्दशी , भीष्म पंचक ) के अनुसार पर्व विशेष उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं . सुबह -सवेरे स्त्रियों और पुरुषों द्वारा तारों की छाँव में किये जाने वाली स्नान -पूजा और भजन , गीतों से पूरा वातावरण पवित्र हो उठता है .
कार्तिक मास में दामोदर भगवान् को रिझाने के लिए ग्रामीण आंचलिक बोलियों में गाये जाने  वाले गीतों की बात ही अनूठी है . इन  गीतों ( पाँवड़ियाँ , रसोई , बुहारी , आरती आदि ) के माध्यम  से वे श्रीकृष्ण को विभिन्न वस्त्रादि , भोजन , खडाऊ आदि भेट/अर्पित  करती हैं .  अपनी सरल सरस भाषा में स्त्रियाँ /पुरुष योगेश्वरश्रीकृष्ण को अपने मध्य का एक आम इंसान ही बना लेते हैं और श्रीकृष्ण अपनी  इंसानी लीलाओं के माध्यम से ही तो जन -जन से जुड़े हुए थे . वही बालसुलभ मिट्टी खाने , माखन मिश्री चुराने , माता को विभिन्न उलाहने देने , मित्रों के साथ चुहलबाजी जैसी कारस्तानियाँ ही उन्हें स्त्री /पुरुष  से इतना जोड़े रखती हैं कि वह उनके बीच का तू ही हो जाता है .

कार्तिक मास में श्रीकृष्ण को खड़ाऊ भेंट /अर्पित किये जाने वाला ऐसा ही एक लोक भजन/गीत " श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ" मुझे बहुत प्रिय है!
राधा दामोदर , जयपुर 

" श्रीकृष्ण की पाँवड़ियाँ"
म्हे थाने पूछा म्हारा श्री भगवान्
रंगी चंगी पाँवड़ियाँ कुण घाली थांके पाँव
म्हे तो गया था राधा खातन के द्वार
वे ही पहराई म्हाने पवरियाँ जी राज़
इतनी तो सुन राधा खातन के जाए
खातन बैठी खाट बिछाए
म्हे तो ए खातन थां स लड़बा ना आया
थे मोहा जी म्हारा श्री भगवान्
थार सरीखी म्हारी पाणी री पणिहार
कान्हा सरीखा म्हारा गायाँ रा गवाल
राधा खातान में हुई छे जो रार
उभा -उभा मुलक श्री भगवान्
सामी पगां थे लड़बा ना जाए
आछो ए राधा मांड्यो छे रार
आप कुवाया पाणी री पणिहार
म्हाने कुवाया थे गायां रा गवाल ...

इस गीत में वर्णित कथा इस प्रकार है कि एक दिन श्री भगवान् के चरणों में रंग -बिरंगी खडाऊ देख कर श्री राधा उनसे पूछती है कि आपके पैरों में इतनी सुन्दर खडाऊ कहाँ से आई . श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि मैं खातन ( बढई की पत्नी ) के घर गया था , उसने ही मुझे इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट की . श्रीराधा को यह सहन नहीं हुआ।  जलती- भुनती राधा उस खातन से लड़ने पहुँच गयी कि वह इतनी सुन्दर खडाऊ भेंट कर श्रीकृष्ण को रिझाना /मोहना चाहती हैं .   इस पर खातन राधा को  आड़े हाथों लेते हुए कहती है कि " राधा ,तू अपने आपको क्या समझती है. तेरे जैसी तो मेरे पानी भरने वाली पनिहारनियाँ हैं , और तेरे कृष्ण जैसे मेरे गायों को चराने वाले गवाल , मैं क्यों उन्हें रिझाउँगी ."  राधा का गर्व चूर -चूर हो गया .
भक्त के प्रेम के वश में बंधे श्रीकृष्ण तिरछे मुस्कुराते हुए कहते हैं ... " राधा , ये तूने क्या किया , मैं तो भक्तों के प्रेम में बंधा हूँ , उनके लिए उन जैसा ही सामान्य हूँ , सामने होकर लड़ने गयी तब भी मैं तो ग्वाला ही रहा , तुमने स्वयं को भी पनिहारन कहलवाया ".
श्रीकृष्ण का प्रेम सामान्य मानव में भी अद्भुत साहस  भर देता है।  इसी साहस ने उस स्त्री के मुंह से ये बोल बुलवाये। अपनी विविध लीलाओं से मन को मोहने वाले मनमोहन श्रीकृष्ण  प्रभावी सन्देश देकर जनमानस में अपनी छवि अंकित करते हैं।  श्रीकृष्ण ने जिसकी अंगुली पकड़ी , निर्भय हुआ !!

इस गीत में प्रेम और ईर्ष्या के कारण होने वाली तकरार तो है ही और उससे भी बड़ी सीख  है कि ईर्ष्याग्रस्त होकर जानबूझकर किसी से झगड़ा मोल लेने वाले का अपना मान- सम्मान तो कम होता ही है , बल्कि इसी कारण से वह अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को भी अपमानित होने पर विवश करता है .

इस गीत के बहाने ही उस साधारण स्त्री ने उन आत्ममुग्ध , परिवार , अपने रुतबे से गर्वोन्मत्त सभी स्त्री- पुरुषों को सन्देश दे दिया कि जो बेवजह ईर्ष्या से ग्रस्त होकर उन पर अधिकार ज़माने की चेष्टा में अपने सबसे प्रिय व्यक्तियों की जगहंसाई करवाते हैं . एक तो यह कत्तई आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है ,उसका  दूसरे के लिए भी उतना ही महत्व हो . दूसरी ओर यह भी है कि वह ख़ास व्यक्ति उस आम व्यक्ति के प्रेम /भक्ति /स्नेह के लिए उस जैसा साधारण ही बना रहना /दिखना चाहता हो. 
जो आपके लिए अनमोल हो , हो सकता है कि दूसरों के लिए उसका मोल कौड़ी भर भी ना हो ! 

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

डूबते सूरज को अर्ध्य देने वाला इकलौता छठ - पर्व .....

आज छठ पूजा है , छठ व्रती और श्रद्धालु शाम को ढलते सूरज को अर्ध्य देंगे।  यह इकलौता ऐसा पर्व है जहाँ डूबते सूरज को  दिया जाता है।आज वर्षों बाद इस दिन बेचैनी नहीं है।    माँ वर्षों से करती रही है इस व्रत को , उनका विश्वास रहा कि पापा इस व्रत के कारण ही अपनी जिंदगी के अनमोल दस वर्ष और जी पाये। पापा भी इस कठिन व्रत की पालना के समय उनका पूरा ध्यान  रखते थे।  व्रत के लिए आवश्यक फल फूल सब्जियाँ   , दौरे , सूप जैसी समस्त सामग्रियों को लाने और ढंग से धोकर जमाने तक में भूखी प्यासी माँ की सहायता के लिए सहायक उपस्थित होते थे।  
पिता के जाने के बाद व्रत करते हुए भी इन सब चीजों की व्यवस्था माँ स्वयं करती , बाजार जाती , सब्जी फल सूप वगैरह खुद चुन कर लाती , मन हमेशा चिंताग्रस्त बना रहता। माँ को सबने बहुत समझाया  कि वे अब इस व्रत को त्याग दें , जिनके लिए करती थी वही  नहीं रहे , और जिन संतानों के लिए करती रही है ,   वे स्वयं खुद कर लेंगे अपनी सुरक्षा के लिए , मगर माँ होते हुए समझ सकती हूँ   ममता की लाचारी। दिल के दौरे के बाद हुई  एन्जियोंप्लास्टी के कारण  आखिर माँ को यह व्रत दूसरे को सौंपना ही पड़ा।  कहते हैं कि इस व्रत को छोड़ा नहीं जा सकता , किसी दूसरे को अर्पण किया जाता है , यानि वह व्यक्ति इस व्रत को करने का संकल्प लेता है ! पिछली छठ को बिहार जाकर इस व्रत को त्याग आई माँ और यही कारण है कि आज मैं कुछ निश्चिन्त हूँ। हालाँकि उन माताओं की भी चिंता मन में है जो अपने परिवार के समुचित सहयोग के बिना इस व्रत को कर रही होंगी। 
माँ के व्रत के बहाने जयपुर के गलता घाट  की रौनक , प्रसाद , व्रतियों के सूप में दूध का अर्ध्य , सात स्त्रियों से प्रसाद माँगना , सिन्दूर लगाना , पहाड़ी पर  सूर्य देवता के दर्शन आदि की कमी भी महसूस हो ही रही है !

तीन दिन तक बिना पानी -खाने के अलावा रात में जाग कर ठेकुवे का प्रसाद बनाना , रात भर खुले आसमान के नीचे दूसरे दिन  उगने वाले सूर्य का इन्तजार करना , ठन्डे पानी में गीले बालों और  वस्त्रों के साथ खड़े रहना  निश्चित ही इतना आसान नहीं है। परिणाम स्वरुप अक्सर व्रती स्त्रियां चिड़चिड़ी हो जाती हैं। दौरे को रखने , अर्ध्य देने आदि के दौरान कई बार लड़ने झगड़ने के स्वर सुनाई देते हैं। 
 एक बार का दृश्य याद है जब सूर्योदय के अर्ध्य के बाद व्रती स्त्री के पति द्वारा लाये गए चाय के ग्लास को उठाकर उस स्त्री ने फेंक दिया , पता नहीं किस बात पर गुस्से में भरी हुई थी। इस दौरान उनके चिड़चिड़ेपन पर मुझे गुस्सा नहीं आता , डिहाईड्रेशन के कारण उनके चिड़चिड़ेपन को समझा जा सकता है।  हालाँकि इस व्रत को सिर्फ स्त्रियां नहीं करती , पुरुष भी तड़के ठण्ड में ठिठुरते गीले कपड़ों में नारियल आदि लिए सूर्यदेव का इन्तजार करते नजर आते हैं , वहीं कुछ लोग पत्नी या माँ के सहयोग के लिए भी उपस्थित रहते हैं।  इन व्रत त्योहारों के धार्मिक कारण कुछ भी हों , परन्तु ये आयोजन परिवार और समाज के बीच एक सेतु बनाने का कार्य अवश्य करते हैं। 


जयपुर के गलता घाट पर छठ की पुरानी तस्वीरें 

मिलजुल कर पर्व की तैयारियां करना ,एक दूसरे की सहायता करना , गीतों के बोलों के साथ  हंसी- ठिठोली , एक ही छत के नीचे सबका इकट्ठा होना परिवार और समाज को एकजुट रखने में महती भूमिका निभाता है।  समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अपने परिवार में बच्चों को आपस में मिलजुल कर तथा पास पड़ोस को भी उल्लास में सम्मिलित करने को प्रेरित करना उचित है , बात उल्लास और आनंद के संचार की हो  ना कि गहने , कपडे , घरेलू उपकरणों ,विलास की सामग्रियों के थोथे प्रदर्शन का प्रतीक बन कर ना रह जाए ये उत्सव , त्यौहार !  

परिवारों , समाजों में  उल्लास बना रहे , मन का उत्सव भी रगीन खुशनुमा हो , छठ पर्व की अनगिनत शुभकामनाएँ !

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

प्रगतिशीलता बनाम पूर्वाग्रह …

"राँझणा"  ना में एक दृश्य है --  जे एन यू में पाईप के सहारे चढ़ते को एक प्रगतिशील ग्रुप के छात्र देख लेते हैं और चोर समझ कर पुलिस के हवाले करने  से पहले काफी विमर्श करते हैं कि इसका क्या किया जाए , यह इस तरह पाईप पर क्यों चढ़ रहा था , पुलिस को सौपने का तात्पर्य कि हम सिस्टम पर भरोसा कर रहे हैं जबकि हमें सिस्टम का विरोध करना है , इसकी गरीबी का कारण अशिक्षा है आदि -आदि  . अंग्रेजी में  गरीबी और अशिक्षितों पर हो रहे इस विमर्श के बीच नायक कहता /सोचता है -- इस समय मेरी सबसे बड़ी समस्या भूख है और उसका हल  चाय -समोसा है।  (निर्देशन की कुशलता से इस दृश्य की और अधिक मारक बनाया जा सकता था )

सामाजिक समस्याओं पर होने वाले विमर्श की परते उधेड़ता बहुत ही मारक है यह दृश्य। हमारे देश /समाज में होने वाले अधिकांश विमर्शों की यही दशा /दिशा है।  गरीबों और मजदूरों की समस्याओं पर पर विमर्श होता है फाईव स्टार होटल या होटल जैसी ही सुविधाओं वाले एयरकंडीशंड कमरों में खाए पिए अघाए व्यापारियों द्वारा , देश के ग्रामीण अशिक्षितों की समस्याओं पर विचार होता है महज अंग्रेजी में ही गिटरपिटर करते डिग्रीधारकों द्वारा।  विमर्शकर्ता  इन विमर्शों की सीढ़ी  चढ़ते  पहुँच जाते है समाज के उच्चतम श्रेणी में और  जिस पर विमर्श किया जा रहा है , वह अनगिनत वर्षों से वहीँ  का वहीँ जमा। विमर्श जिस पर किया जा रहा है ,  उन्हें इन विमर्शों में शामिल किया जाता , उनकी भी राय ली जाती ,तो शायद इन विमर्शों का स्वरुप कुछ और होता, समस्या वास्तविक धरातल पर समझी जाय तो  उसका निराकरण संभव है।  

यही हाल स्त्री और उससे जुडी समस्याओं के विमर्श का है।  इस  करवा चतुर्थी  पर भी प्रगतिशीलों का विमर्श बदस्तूर जारी रहा  . एकतरफा घोषणा या दिशा -निर्देश जारी करने  से पहले  इन रस्मों को धारण /निभाने वाली स्त्रियों की राय तो ले लेते कि वे चाहती क्या हैं , या शायद इनके लिए इन स्त्रियों की राय मायने नहीं रखती क्योंकि व्रत उपवास का मतलब पति की गुलामी करना ही होता है।  यह मान  बैठना कि व्रत /उपवास करने वाली सभी विवाहित स्त्रियाँ बेड़ियों में जकड़ी है , एकतरफा  सोच है , पूर्वाग्रह है।   
 
आप जिनकी समस्या पर बात कर रहे हैं , दरअसल वे अपनी समस्याओं का हल किस प्रकार चाहते हैं , यह अधिक मायने रखता है. ना कि आप द्वारा थोपे गए विचार। जब आप धर्म विशेष द्वारा थोपी गयी धारणाओं का विरोध धूमधाम से करते हैं तो यह भी निश्चित होना चाहिए कि आप थोपे गए विचारों का विरोध करते हैं  , स्वयं  अपने विचार थोपते नहीं। जो कार्य आप नहीं करते , वह दूसरे  के लिए लिए गुलामी ही हो , यह आवश्यक नहीं।  मुश्किलें तब आती है जब सभी समस्याओं के  हल हम एकतरफा सोच के साथ करना चाहते हैं। या वे  शायद यह मान कर ही चलते हैं कि विवाहित स्त्रियाँ  को कोई वजूद / स्वतंत्र व्यक्तित्व ही नहीं है , और यदि आप ऐसा ही मानकर चलते हैं तो आपसे मूढ़ और कोई नहीं।

(इस विषय पर कविता जी का यह लेख उल्लेखनीय है )

व्यक्ति की स्वतन्त्रता में विश्वास करने वालों को स्त्रियों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में सहायता करनी चाहिए , ना कि अपनी बनी बनाई सोच परोसकर उसपर ही अमल करने की समझाईश।  

इसी प्रकार सामाजिक समस्याओं के हल सिर्फ अंतरजातीय विवाहों में ढूँढने वाले लोग भी  मुझे ऐसी ही एक तरफ़ा सोच वाले नजर आते हैं , समाज के विरोधाभास पर प्रश्नचिन्ह लगाते  इन लोगों के   विचारों में कितना विरोधाभास है , ये स्वयं भी नहीं जानते।  एक और ये  सिर्फ प्रेम विवाह की स्वीकृति चाहते हैं , दूसरी ओर इनकी धारणा  है कि विवाह अपनी जाति  धर्म में करना जाहिली है।  मतलब यह प्रगतिशील  समूह  सिर्फ यह मानकर ही चलते हैं कि दो इंसानों के बीच प्रेम तभी संभव है जब वे विजातीय हो। 
क्या यह भी अपने आप में एक भयंकर पूर्वाग्रह  नहीं है। 

हम सभी जानते हैं कि एक ही  या एक जैसे माहौल में रहने वाले लोग एक दूसरे  के साथ ज्यादा सुविधाजनक होते हैं।  क्या किसी शाकाहारी के लिए मांसाहारियों के साथ तालमेल बैठना आसान है , पान सुपारी भी नहीं खाने वाले लोग क्या मादक द्रव्यों के सेवन करने वालों के साथ सुविधानाजंक निबाह कर  सकते हैं ?यह सही  है कि व्यवहार या विवाह यदि प्रेम के लिए हो तो लोग तालमेल बैठाना /सामंजस्य /समझौता करना पसंद करते हैं …. यानि घूम फिर कर बात तो समझौते और सामजस्य पर ही आई , विवाह या व्यवहार प्रेम /पसंद से हो या प्रायोजित !!

अब आँखें खोलकर बताएं कि पूर्वाग्रही कौन है , एकतरफा सोच किसकी है !!

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

गिरा अनयन नयन बिनु बानी.... शब्दों के चितेरे तुलसीदास


रामचरितमानस हिन्दुओं का एक प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ है। शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में देवी भगवती /अम्बे की आराधना के  अतिरिक्त  रामचरितमानस के नवाह्न पारायण का भी विधान है। 

रामचरितमानस सिर्फ एक धार्मिक ग्रन्थ की भांति ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की  चमत्कृत कर देने वाला महाकाव्य /कृति के रूप में भी  उल्लेखनीय है।  तुलसीदास की काव्य प्रतिभा अलौकिक प्रतीत होती है ,  अब वह श्रीराम के अलौकिक रूप /शक्ति के प्रभाव /वर्णन के कारण है या प्रकृति प्रदत्त , यह राम ही जाने। 

अपनी सम्पूर्ण धार्मिक  , आध्यात्मिक  चेतना को एकत्रित कर सिर्फ प्रभु को सर नवाते इस अमूल्य कृति का पाठन करें , या एक सामान्य पाठक के समान  तुलसीदास की अभूतपूर्व काव्य प्रतिभा युक्त रोचकता और नाटकीयता  में  एक मर्यादित समाज की संकल्पना की मीठी झील की तरह रस के भंवर में गोते लगाये , प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा और मनसा पर निर्भर है।   

तुलसीदास अपनी   कृति में एक मर्यादित समाज में चहुँ ओर सुख शान्ति की कामना सहित  समाज में प्रत्येक संभावित  रिश्ते के लिए अत्यावश्यक मापदंड या जीवनदृष्टि निर्धारित  करते प्रतीत होते हैं।  समाजों में मानव के बीच पलने वाले प्रत्येक रिश्ते से जुडी भावनाएं , मानव मन के विभिन्न आयाम , गुण -अवगुण , चरित्र  , कार्य , कुछ भी तुलसीदास की दृष्टि और शब्दों से बाकी नहीं रहा।   उनके काव्य लेखन की विराट  प्रतिभा ने आधुनिक युग में भी मानव मन की किस दशा पर  उनके नेत्रों और शब्दों की धार को समाहित नहीं किया , कुछ शेष  नहीं रहा.

तुलसीदास जी ने शील और गुण के आदर्श प्रस्तुत करते हुए साबित किया कि अध्यात्म सिर्फ संन्यास या वैराग्य ग्रहण करना ही नहीं है , समाज में रहते हुए सामाजिक  जिम्मेदारियों को पूर्ण करते भी सन्यासी रहा  जा सकता है। समाज के कल्याण के लिए उच्च  आदर्शों और  मर्यादा की स्थापना करते हुए  दुष्टों  पर भी अपनी दृष्टि केन्द्रित करते हैं।  प्रजावत्सल राजा के सम्पूर्ण गुणों की मर्यादा तय करते हुए  भी साधारण व्यक्ति के सभी मनोभावों को विभिन्न चरित्रों के  भ्रातृत्व , पितृत्व ,  मातृत्व   माया , मोह , ममता , लोभ , ईर्ष्या , चुगलखोरी ,  आदि सभी गुणों -अवगुणों को शब्दों में चित्रित किया है।   
  
रामचरितमानस के  प्रथम सर्ग  बालकाण्ड में तुलसीदास  विभिन्न दृश्यों जैसे श्रीराम और उनके भ्राताओं  के जन्म ,स्वयम राज दशरथ और रानियों के साथ जनमानस की ख़ुशी , नगर की शोभा ,   बाल्यकाल की क्रीड़ायें , गुरुकुल के कठोर अनुशासित जीवन के लिए जाते पुत्रों से भावविह्वल माता -पिता , जनकनंदिनी सीता से श्रीराम का प्रथम दर्शन आदि  में चमत्कृत करती शब्दों की भाषा  से समस्त  मानवीय भावनाओं और  संवेदनाओं को उद्धरित करते हैं।  

बालकाण्ड में श्रीराम और सीता के प्रथम मिलन का दृश्य बहुत ही मनोरम बन पड़ा है।  अपने गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में श्रीराम अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ सीता  स्वयंवर में उपस्थित हैं। राम और लक्ष्मण  गुरु की पूजा अर्चना के लिए   बाग़ से फूल  चुनने पहुंचे ,   जनकनन्दिनी सीता भी सखियों के साथ बाग़ में सरोवर के नजदीक  गिरिजा मंदिर में पूजन के लिए आती है। तुलसीदास ने इन दृश्यों में शब्दों की सुन्दर चित्रकारी द्वारा राम और सीता के मनोभावों का मनोरम वर्णन किया है।  मानव रूप में जन्मे  राम मानव मन के किसी भी कोमल भाव से अछूते नहीं रहे , युवावस्था में भावी जीवनसंगिनी को निरखते राम के मन में प्रेम और क्षोभ एक साथ हिलोरे मारता है , वहीँ सीता भी भावी जीवनसाथी के रूप में राम की कामना के साथ पिता जनक के प्रण का स्मरण कर दुखी होती हैं। तुलसीदास के शब्दों में सीता के प्रथम दर्शन के बाद एकांत में चन्द्रमा से सीता के मुख की तुलना करते  किशोर /युवा मन की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं.

तुलसीदास शब्दों के चितेरे रहे.  शब्दों की  कारीगरी से मानव मन के विभिन भावनाओं का कुशल चित्रण करते हैं. तुलसीदास अपने शब्दों के भाव कौशल से किशोर हृदयों के प्रथम मिलन के विलक्षण मनोहारी दृश्यों की रचना करते हैं। स्वयं तुलसीदास के शब्दों में ही देखें … 

राम के सौंदर्य का बखान करती सखी कहती है 
"  गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।।
यानि वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है। 

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही
कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहते हैं- (यह ध्वनि ऐसी आ रही है) मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥

ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा (को निहारने) के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए.
शाब्दिक अर्थ है " नीमि (निमि पलकों के झुकने  को कहते हैं ) ने पलकों में रहना छोड़ दिया यानि  नयन खुले के खुले रह गए " . 
भावार्थ निमि जो जनक के पूर्वज रहे हैं , ने होश्राप मुक्त होने पर अपने रहने के लिए पलकों में स्थान माँगा था। चूँकि जनकनंदिनी सीता उनकी  पुत्री हुई , और मर्यदावश बेटी दामाद के मिलन को देखना  उचित नहीं माना जाता। इसलिए ऐसा भान हुआ कि राम और सीता के मिलन को देख निमि  पलकें छोड़ कर चले गए। 

देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥

सीताजी की शोभा देखकर श्री रामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। (वह शोभा ऐसी अनुपम है) मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो।
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥

जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें, किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं।

सीताजी भी श्रीराम की छवि से चकित और मुग्ध हैं… 

थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥

श्री रघुनाथजी की छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो।

लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥

जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥

नेत्रों के रास्ते श्री रामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं, कुछ कह नहीं सकती थीं।
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥

जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं- बड़ी देर हो गई। (अब चलना चाहिए)। कल इसी समय फिर आएँगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥

धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥

सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और (उनका ध्यान करती हुई) अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं।

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।

निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥
मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्री रामजी की छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है। (अर्थात्‌ बहुत ही बढ़ता जाता है)।

रात्रि के नीरव एकांत  में   प्रेम से वशीभूत हो चन्द्रमा के मुख से देवी सीता की तुलना करते मनन करते  हैं ....

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥

बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
(उधर) पूर्व दिशा में सुंदर चन्द्रमा उदय हुआ। श्री रामचन्द्रजी ने उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजी के मुख के समान नहीं है।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥
खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर (उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण) विष इसका भाई, दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकी (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥
फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देने वाला है, राहु अपनी संधि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को (चकवी के वियोग का) शोक देने वाला और कमल का बैरी (उसे मुरझा देने वाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत से अवगुण हैं (जो सीताजी में नहीं हैं।)।

किशोर मन की समस्त अवस्थाएं- सौन्दर्य , चकित , प्रेम , लज्जा , भय ,क्षोभ , अभिव्यक्ति में शेष कुछ न रहा ! 

अद्भुत … 

कुछ और यहाँ  भी ....